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शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

विरोध की दिशा बदलिए,

उत्तर प्रदेश के मोहनलालगंज में एक और महिला की लाश महान सांस्कृतिक विरासत पर औधे मुह पड़ी है। लाश अपने साथ हुई बर्बरता का अमिट गान बहते हुए खून के साथ सुना रही थी। जिसमें सामाजिकता समेत संस्कृति के पैमाने स्वत: छोटे होते जा रहे थे। उसके निर्वस्त्र शरीर ने भी अपने आराध्य से किसी ना किसी रूप में आ कर खुद को बचाने की गुहार की होगी, लेकिन शायद इंसानी बर्बरता को देखकर ईश्वर की हिम्मत भी ना हुई कि वो उसकी मदद करने आगे आ सकेँ। इसीलिए एक लाश सभ्य समाज के प्राथमिक मंदिर, प्राथमिक विद्मालय के प्रांगण में पड़ी हुई थी। लाश खुद ही गवाही दे रही थी अपने प्रति अपराध का, लेकिन हम अभी भी खोज रहे थे अपराधी को, ताकि उसके लिए फाँसी या उससे अधिक कुछ जो हो सकता था मांग कर अपने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर इस विषय से अपनी अपनी नैतिकता का पल्ला झाड़ लें।


यह पहली बार नहीं हुआ था, जब कुछ इसी तरह की स्थितियों का हम सामना कर रहे हैं। इससे ना जाने पहले कितनी बार कुछ इसी तरह के हादसों का जो समाज स्त्री के प्रति करता हैं, हम उन अपराधों के गवाह बने हैं। लेकिन हम सहज हैं। थोडी देर के लिए असहज हो सकते हैं लेकिन फिर सहज हो जाते हैं।  इसका एक प्रमाण हर हादसे के बाद उपजे सवाल हैं, जो उस महिला की पवित्रता से लेकर उसके घटना स्थल तक पहुचने तक के जवाबों में पवित्रता खोजना चाहते हैँ, ताकि कुछ तो मिल सके चर्चा के विश्लेषण के लिए जिसे उदाहरण या तथ्य बना कर लोगों के लिए सबब बना सकें। इन उदाहरणों का उपयोग करके हम महिलाओं को सार्वजिनक स्थानों पर तयशुदा समय के बाद स्थान छोड़ने का अघोषित नियम बनाना चाहते हैं।
निसंदेह यह सामान्य अपराध नहीं है, फिर भी हम इनके प्रति काफी सहज हैं, आखिर हम इन अपराधों को इतनी सहजता से कैसे ले सकते हैं? इतनी सहजता की मानवीय मूल्यों की अर्थी भी सहज रूप से निकाले जा रहे है कि हमें खुद भी पता नहीं चल रहा हैं कि हम किस ओर खडें हैं। अपराध के बाद कुछ पुलिस कर्मियों को इसलिए संस्पेंड कर दिया क्यूँ कि उन्होने निर्वस्त्र पड़ी लाश पर कपड़ा तब तक नहीं डाला जब तक उसका उन्होंने प्राथमिक निरीक्षण नहीं कर लिया, और घटनास्थल पर कागजी कार्यवाही के लिए फोटोग्राफ्स नहीं उतार लिए। निसंदेह यह एक संवेदनहीन रवैया था, जिसके लिए उन्हें तुंरत बर्खास्त कर दिया गया। लेकिन इन सब के बीच एक सवाल जो अनदेखा किया जा रहा हैं कि क्या सबसे पहले पुलिस घटनास्थल पर पहुची थी? नहीं ना! वहां काफी भीड़ थी, आखिर उनमें से किसी की संवेदनशीलता क्यूँ जगी, आखिर वहां खडें लोगों में से किसी ने कपड़े का एक टुकड़ा उस शरीर पर क्यूँ नहीं डाला। आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी थी, कि उस भीड़ में से किसी एक के हाथ भी उस निर्वस्त्र शरीर पर कपडा नहीं डाल सका। पुलिस वालों को कम से कम अपनी संवेदनहीनता का दंड कुछ हद तक मिल गया लेकिन आप का क्या किया जाए? आप को क्या कहा जाए? अगर हम इसे अपराध और अपराधी के प्रति सहजता नहीं कहेगें तो क्या कहेगें।
निर्वस्त्र और मृत शरीर आपके कपड़े का मोहताज नहीं था, और ना ही वह उसकी मांग कर रहा था। लेकिन कम से कम अपनी संस्कृति की निर्वस्त्र लाश पर तो दो गज कपड़ा डाल ही सकते थे। लेकिन नहीं हम नहीं कर पाए, क्यूँकि बहुत कुछ हो जाता। जो कपड़ा मिलता वो पुलिस साक्ष्य के रूप में रखती, सवाल करती और परेशान करती इसलिए हम आप ने बड़ी ईमानदारी से अपने हाथों को बाधें रखा और इंतजार किया पुलिस के आने का, आखिर समाज के सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की है आपकी थोडे ही ना। तो पुलिस आई, अब पुलिस मंगल से तो आई नहीं थी, वो भी हम और आप के बीच से ही आई थी, इसलिए उसने भी वही किया जो हम और आप थोडी देर पहले तक कर रहे थे यानी निरीक्षण। उसे भी कपड़ा डालने की आवश्यकता तब तक नहीं हुई जब तक वह घटना के लिए प्रारंभिक साक्ष्य नहीं जुटा लिए।
निर्वस्त्र शरीर पर कपड़े ढकने की बात को पर जोर देकर यहां सांस्कृतिक या नैतिकता की बहस नहीं कराना चाहता। लेकिन इस बहस में एक ही सवाल रखना चाहते हैं कि क्या सच में हम सच में सामजिक प्राणी होने का दावा कर सकते हैं? इस घटनाओं के बाद नेताओं के बयान के बाद उनकी आलोचना का रस तो हम लेते रहते हैं लेकिन अपनी आलोचना कब करेगें। इन अपराधों के प्रति जिस तरह की सहजता (थोडी असहजता के साथ) हमें हैं, उसको लेकर हम कब असहज होगें। कब हम अपने खिलाफ खडे होगे, और सहज हो चली प्रवृत्ति को बदलेगें। सामाजिक अपराधों में हमारा सहज प्रवृत्ति का ही नतीजा हैं कि आँकडों के पैमाने भी काफी ऊचें हैं, वरना आकडों को भी इन अपराधों को दर्ज करने में काफी परेशानी होगी।
मोहनलालगंज दिल्ली नहीं है, जहाँ अश्लीलता और खुलेपन का आरोप लगा कर छोटे शहर अपनी संस्कृति को इंडिया से इतर कर भारत में होने का दावा कर लेते है। मोहनलालगंज उसी भारत का हिस्सा हैं जहाँ संस्कृति के पैरोकार औऱ पैमाने दोनो ही हर दिन बदलती संस्कति को नापते रहते है। ऐसे में इस तरह के हादसे केवल हमारी और आपकी महिला के प्रति अपराधों की सहजता नहीं हैं तो क्या है। बस इसी पर चोट करने की जरूरत पर बल देना चाहता हूँ कि कुछ तो बदल जाए इन सबके बाद भी। ताकि आने वाली पीढी ऐसे सवालों पर सहज तो ना बनी रहे। होसके तो विरोध करिए, लेकिन इस बार सरकार का नहीं, किसी नेता के संवेदनहीन बयान का नही, किसी प्रशासन की अकर्मणयता का नहीं। हो सके तो उतरिए अपने खिलाफ, करिए खुद के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व, जिसमें सहज हो चली संस्कृति को असहज बना दिया जाए। कि इस तरह के हादसों को हम और आप सहजता से पचा ना ले जाए। यह दौर अपना विरोध करने का है, वरना ना जाने कितने प्रांगण ऐसी ऐसी बर्बर हादसों के गवाह बनते रहेगे। खुद की संस्कृति को बदलने के लिए करिए अगुवाई। नहीं कर सकते तो कृपया किसी नेता के आँकड़ो पर उगली मत उठाईएं।वो सही हैं। कि उनका प्रदेश महिलाओं के हिंसा के मामले में देश में 4 स्थान पर है। हो जाइए खुश और सहज कि आप पहले पर नहीं हैं। 

शिशिर कुमार यादव
इस लेख को डेली न्यूज एक्टविस्ट ने अपने अखबार में 2 अगस्त 2014 को जगह दी है।



सोमवार, 9 जून 2014

बदायूं और दिल्ली की लड़की का फर्क ...

उत्तर प्रदेश के बदायूं में दो लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार और फिर उनकी हत्या के  बाद मैं इस बार मुठ्ठी भीचे सड़को पर नहीं था, और ना ही रातो को रिक्लेम करो या हम क्या चाहते आजादी सरीखे नारे  लगा रहा था। मेरे अलावा भी बहुत सारे लोग इस बार सड़को पर नहीं थे, जो 16 दिस्मबर 2012 के बाद कई दिनों तक सड़को पर किसी की परवाह किए बिना सड़क पर तंत्र को जड़ से झकझोरने पर आमादा थे, और बिना कोर्ट के निर्णय के आए, एक ऐसा माहौल बना दिया गया कि फाँसी के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। यह स्पष्ट नहीं हो रहा इस बार हम लोग सड़क पर क्यूँ नहीं थे? आखिर अंतर क्या था इस घटना और 16 दिसम्बर की घटना में? यहाँ एक नहीं दो जिंदगियों को लाशों में तब्दील कर दिया गया। बर्बरता की सीमा कही से कमतर नहीं थी, बलात्कार के बाद जिंदा पेड़ पर टांग दिया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट इसकी गवाह है, कि बलात्कार के बाद उन्हें मारा गया, वो भी नृशंस तरीके से, फिर भी हम सड़को पर ना थे।

इन सबके बाद आखिर ऐसी क्या कमी रह गई जो हमारी संवेदना को उद्वेलित न कर सका और हमें सड़को पर ना ला सका। क्या ये बलात्कारी और हत्यारे उस स्तर के नहीं थे जो 16 दिसंबर 2012 के थे। तो क्या मौसम खिलाफ था, दिसम्बर में तो हाड कपा देने वाली ठंडक थी फिर भी हम सड़को पर थे। तो क्या पुलिस की भूमिका स्पष्ट नहीं थी? इस घटना में तो पूर्णतया मिलीभगत थी 16 दिसम्बर 2012 में पुलिस की गैरजवाबदेही थी फिर भी हमने कमिश्नर के कॉलर को पकड़ लिया था। इस बार जिस निजाम के खिलाफ जाना था वो बहुत ताकतवर था, ऐसा भी नहीं 16 दिंसम्बर 2012 में तो राज्य और केन्द्र दोनों के खिलाफ एक साथ खिलाफ खडें थे, उत्तर प्रदेश की सरकार उनके सामने कमजोर ही है। तो मीडिया के कैमरे नही थे? ऐसा भी नहीं हैं, राजनेताओ के भ्रमण कार्यक्रम के साथ साथ उत्तर प्रदेश की सरकार के खिलाफ काफी कुछ चला है। तो फिर, क्या 16 दिंसम्बर 2012 के बाद कड़े कानून आ गए इसलिए हम निश्चिंत हो गए थे? ऐसा भी नहीं कानून के बाद बलात्कार की घटनाओं के आँकडे उठा कर देखिए, बलात्कार की घटना में कही कोई कमी नहीं आई है । तो आखिर वजह क्या है?  

लड़कियों कमजोर वर्ग से थी इसलिए वो हमारे सरोकारो को ना झकझोर पाई।  उनका ग्रामीण होना, हमारी बौद्धिक और सिविल सोसाइटी के समर्थन पाने लायक नहीं था, हां यही वो वजहें हैं जिनकी वजह से हम सड़को पर नहीं उतरे। 16 दिसम्बर 2012 के वक्त भी यह सवाल उठा था कि आखिर अब तक चुप क्यूँ थे, जबकि बलात्कार हर रोज देश के किसी ना किसी हिस्से में हकीकत का हिस्सा है, और उनकी बर्बरता भी किसी भी मायने में किसी घटना से अलग नही थी। उस वक्त भी हमारे पास जवाब ना था लेकिन मामला हमारे वर्गीय हिस्से से जुड़ा हुआ था और उस वक्त इस बात से संतोष कर लिया गया कि कोई नहीं, पहले नहीं तो अब ही सही नारी सम्मान और अधिकार के प्रति शायद समाज में इस तरह के विरोध के बाद चेतना का प्रचार प्रसार हो जाए और लम्बे दौर से जिसे यूँ ही सह लिए जाने वाले अपराधा के खिलाफ नाकेबंदी कर दी जाए। उस वक्त भी कानून और अपराध पर कठोर दंड को सीमित भूमिका में ही आँका गया था। सामाजिक चेतना और सामाजिक विरोध की संस्कृति को सिंचित करने पर ही बल दिया गया था। लेकिन 16 दिसम्बर 2012 के बाद काफी कुछ बदला पर विरोध करने की वर्गीय चेतना में कोई खास परिवर्तन नहीं आया, जिसकी वजह से हर दिन कोई ना कोई इस जघन्य अपराध का शिकार बनता रहा और हम चुपचाप अपने सघर्ष को पूर्ण मानकर अपनी अपनी सामाजिक सरोकारिता से पल्ला झाड आराम फरमा रहे थे। आँकडे गवाह हैं और जंतर मंतर में बैठी भागाणा के दलित महिलाएं हमारी वर्गाय चेतना में शून्य हो चुकी सामाजिकता और सरोकारिता पर तमाचा है।

 महिलाओं के अधिकारों की एक छोटी लड़ाई लड़ कर हम कानून के नियमों में परिवर्तन तो करा ले गए, अपराधियों को दंड भी दिला दे जाएगें, लेकिन उस संस्कृति को यू ही फलने फूलने के लिए छोड़ दिया जिसकी छाव में इस तरह के अपराधों की पौध को ना केवल सीचा जाता हैं वरन उन्हें संरक्षित भी किया जाता है। सबसे बड़ा सवाल यह हैं कि समाज इस तरह के अपराधों को किन खाँचों में देखने का प्रयास करता है? समाज का एक वर्ग जहां विरोध कर के परिवर्तन करने की मांग करता हैं वहीं दूसरी और देश के हर कोने में बलात्कार, भ्रूण हत्या और महिलाओं के प्रति अपराध जारी रखता हैं, और इन परिस्थितियों में हम अपनी लडाई को पूरा मानकर चुप बैठे है। तो क्या ये  सघर्ष को बीच में छोड़ देना सरीखा नहीं हैं। ऐसे में यह सवाल अपने आप में महत्वपूर्ण हो जाता हैं कि एक कठोर कानून कहाँ तक महिलाओं और उनके अधिकारों को सुरक्षित कर सकेगा। जबकि समाज महिलाओं के प्रति अपनी सामंती और पित्रृसतात्मक सोच से बाहर निकलने के लिए तैयार ही नहीं हैं। जिस समाज में महिलाओं से जुडे अपराधों में महिलाओं को अपराधी बनाने की प्रवृत्ति प्रमुख हैं, उस समाज में इस तरह की चुप्पी, और महिला की पृष्ठभूमि और वर्ग को देखकर कर अपनी आवाज उठाना केवल आत्ममोही प्रयास होगा

किसी समाज में निम्न जाति के लड़की के साथ बलात्कार जैसे अपराध को अंजाम देने के बाद उसका सार्वजनिक रूप से मार कर पेड से लटका कर प्रदर्शन करना उसी बर्बर मानसिकता का प्रमाण हैं जो पुरूषों का महिलाओं के प्रति असहिष्णुता, संप्रभु जाति का अपने से निम्न जाति के प्रति सांमती प्रवृत्ति का द्योतक है। अगर इस तरह की संस्कृति का विरोध नहीं किया गया तो हम सामाजिक गैरजिम्मेदारी औऱ राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव को अनदेखा कर रहे है। जो इनका मूल हैं। जो आज भी नारी अधिकारों के रास्ते तय कर रहें हैं वो नारी देह को आजाद करने के लिए तैयार ही नहीं हैं। हम किस ओर लड़ रहे हैं यह एक महत्वपूर्ण सवाल हैं। हम लगातार असली जड़ को लगातार अनदेखा किए जा रहे हैं जिनसे हमें सच में लडना हैं। हम कब तक अपराधियों से अपराध के लिए लड़ते रहेगे ? इस लडाई से राजनैतिक जिम्मेदारी को एक हद तक जवाबदेह बना लेगें लेकिन सामाजिक जवाबदेही के इस तरह की किसी भी राजनैतिक जवाबदेही का कोई औचित्य नहीं होगा। सामाजिक जवाबदेही के बिना हमारी लडाई अधूरी ही रह जाएगी और राजनैतिक जवाबदेही को भी बच निकलने का पूरा मौका मिल जाएगा जैसा कि खाँप पंचायतो के मामले में हआ था। ऐसें में लडाई राजनैतिक दबाब के साथ साथ सामाजिक जवाब देही की ओर मोड़ने की भी जरूरत हैं, जहाँ पितृसत्तात्मक समाज के अलोकतांत्रिक नियमों के तलें महिलाएं एक लम्बे दौर से अपने लोकतात्रिक हको का बलिदान करती आ रही हैं।

इसीलिए महिला अधिकारों के लिए जलाई गई मशाल को अपनी सुविधा के अनुसार कुछ जगहो पर आलोकित करना कही न कही, सामाजिक तानेबाने को सामाजिक जवाबदेहिता से बच निकलने का मौका देने शरीखा होगा। इसीलिए विरोध स्थान, पृष्ठभूमि, वर्ग और जाति के इतर किए जाने की जरूरत है, जहाँ महिला की पहचान किसी दूसरे खाँचों में ना खीची जाए। इस घटना के बाद समाज से किसी बड़ी प्रतिक्रिया का ना आना स्पष्ट करता हैं कि विरोध भी विरोध स्थान, पृष्ठभूमि, वर्ग और जाति में बटा हुआ है, और महिला अधिकारो की लड़ाई लड़ने वाले किसी एक वर्ग या पृष्ठभूमि से आने वालों के लिए ही विरोध की पाठशाला खोलेगें। अगर ऐसा जारी रहेगा तो निश्चिंत रहिए वो वर्ग भी जल्द ही इसकी जद में घिरा दिखेगा जिसके रहनुमा आप बने हुए है। 16 दिसम्बर की घटना उसी का एक प्रमाण थी। जरूरत वर्गीय चेतना के इतर महिलाओ के अधिकारों के लिए ईमानदारी भरे आंदोलन की ताकि आने वाले वक्त में आधी आबादी की आजादी सुनिश्चित की जा सके।

                                                                                                                       शिशिर कुमार यादव

इस लेख को दैनिक जागरण ने अपने राष्ट्रीय संस्करण में 10 जून 2014 को जगह दी है।

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

‘आप’ ‘खाप’ और मीड़िया का अर्नबाइजेशन

आम आदमी पार्टी (आप) ने खाप नाम का जाप क्या किया, देश में तमाम मंचों से खाप पर फिर से चर्चा शुरू हो गई है। चर्चा का रूप राजनैतिक है। चर्चा का स्वरूप कुछ इस तरह है कि जिस तंत्र को खुद सुप्रीम कोर्ट ने वैधानिक रूप से नकार दिया है, बल्कि उसे असंवैधानिक भी कहा है, उसे आम आदमी पार्टी, जो 21 सदी के राजनीति की सबसे बड़ी झंड़ाबरदार है, उसका समर्थन कैसे कर सकती है। भारतीय समाज की में खाप की पहचान एक स्वंयभू जातिवादी संगठन की है जो ना केवल अलोकतांत्रिक है और कई मामलों में अमानवीय तक रही है। उसका समर्थन करने के बाद आप की प्रगतिशीलता पर ना केवल सवाल उठ रहा है वरन उनका राजनीति में खुद को  विकल्प के रूप में पेश करने पर भी सवाल उठ रहे है। यह चर्चा इतनी तीखी और कठोर हो चली हैं कि आम आदमी पार्टी के किसी भी प्रतिनिधि को इस विषय पर दी गयी प्रतिक्रिया को सहज रूप स्वीकार नहीं किया जा रहा है, साथ ही साथ उन्हें भी खाप समर्थक बता कर ही मंचों पर पेश किया जा रहा है। अर्नव गोस्वामी के कार्यक्रम में प्रों. आनंद कुमार के साथ हुई कुछ तंज बहस बस उसी का हिस्सा भर थी।
निंसदेह, आम आदमी पार्टी (आप) खाप के मसले पर बैकफुट पर है, और वो खुद उसी उन्माद का शिकार बन रही है, जो उन्माद कभी उसके समर्थन में अन्ना आंदोलन में भष्ट्राचार के विषय पर उनके साथ खड़ा था, जहां हर वो आदमी भष्ट्राचारी हो जाता था, जो अन्ना का विरोध करता था। ठीक उसी तरह की परिस्थितियां आज है, कि खाप के पक्ष में कुछ शब्द बोल भर देने से आप खाप समर्थित पार्टी हो गई है, जिसका खामियाजा कई मंचो से आलोचना के रूप में झेलना पड़ रहा है।
हम आप खुद खाप का समर्थन नहीं करते और उसका विरोध करते है, लेकिन क्या विरोध करते हुए खाप रूपी तंत्र पर प्रतिबंध लगा भर देने से खाप समाप्त हो जाएंगी? क्या खाप कोई तंत्र है या भवन जिसको ध्वस्त कर देने भर से खाप का आंतक उस समाज से हट जाएगा जहां खाप का आंतक छाया हुआ है? अगर हां तो हम सब को वहाँ चलना चाहिए जहां ये तंत्र और भवन है, उन्हे ध्वस्त करके समाज को खाप जैसी सड़ी हुई व्यव्स्था से मुक्ति दिलानी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है, खाप कोई भवन या तंत्र नहीं जिसको ध्वस्त या सिर्फ प्रंतिबंध और उसकी वैधानिकता पर सवाल उठा देने या तय कर देने से समाप्त हो जाएगी। खाप एक विचार धारा है, जो हर उस व्यक्ति में तंत्र के रूप में स्थापित है, जो दूसरे के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन अपने उन सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर करता आ रहा है जो ना केवल अलोकतांत्रिक है वरन अमानवीय भी है।
हमे समझने की जरूरत हैं जिन खाप पंचायतों का चित्रण हमारी आधुनिक मीडिया द्वारा आम जनमानस को दिखलाया है, वो पूर्ण खाप नहीं है, जहाँ समाज के कुछ बूढें अपने ही समुदाय के पुरूषों के साथ बैठकर दूसरों के बारे में निर्णय सुनाते है, ये हिस्सा खाप का एक छोटा हिस्सा भर हैं जो हाथी के दिखाने के दांत सरीखे है। उस खाप का क्या जो हर दिन हमारी आपकी विचारधारा के रूप में उस छोटे समूह द्वारा तय की गए समस्त निर्णयों को वा केवल स्वीकृति देता है, वरन सामाजिक बल की तरह उन्हें निष्पादित भी करवाता है। ये असली खाप हैं, जो विचारधारा के रूप में वहां के आम जन मानस में घर किया हुआ है, जिस पर हमारी आधुनिक मीडिया में कोई चर्चा नहीं होती हैं, इस ओर आधुनिक मीड़िया की समझ काफी कमतर ही रही है। इसीलिए खाप के विरोध में लड़ी जा रही तमाम लड़ाईयां खाप के विरूद्ध कुछ भी ठोस कर पाने में सक्षम नहीं रही हैं, और खाप आज भी अपने अलोकतांत्रिक व्यवहार को जी रही हैं, मुज्जफरनगर दंगों में बलात्कार आरोपियों के समर्थन में उनका बयान उसकी अगली कड़ी भर है।
खाप पर हो रही तमाम बहसो के जितने भी चित्र खीचे गए है उनमें अधिकतर लड़ाई खाप एक तंत्र के रूप में लड़ी जा रही हैं। खाप एक विचारधारा की बहस शायद पीछे छूट चुकी है, इसीलिए मीडिया खुद जिसका अर्नबाइजेशन (इसे अर्नब गोस्वामी सरीखी पत्रकारिता से ही जोडें) हो चुका है वो खाप एक बर्बर तंत्र को ध्वस्त करने पर ही जोर देता आ रहा है। इसके इतर की बहस से वो काफी दूर हो चुका है और अपनी अदूरदर्शिता के चलते जब भी कोई इस कोई उस ओर सवाल खड़ा करके चर्चा और संवाद स्थापित करने की कोशिश करता है, तो बजाए विचारधारा पर बहस करने के, वो इसे सामाजिक पिछड़ापन, नारी सशक्तिकरण और व्यक्तिगत अधिकारो के हनन के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करके सारी की सारी बहस खाप एक तंत्र तक सीमित कर देता है, जहाँ खाप एक विचारधारा हमेशा ही हाशिएं का सवाल बना रह जाता है, और सारी की सारी लड़ाई खाप एक तंत्र तक ही सीमित रह जाती है।
आम आदमी पार्टी के विचार के बाद भी कुछ इसी तरह की बहस जारी हैं, जहाँ खाप तंत्र को सुप्रीमकोर्ट के निर्णय पर आधार पर खारिज करने की तेजी जरूर है, लेकिन विचारधारा पर बहस का माहौल बना कर चर्चा स्थापित करने की कोई कोशिश नही दिख रही है। समस्त राजनैतिक, सामाजिक और मीड़िया मंचों से विचारधारा की बहस लगभग गायब है। हमे यहाँ समझने की जरूरत हैं कि खाप कोई प्रथा नही है, जिस पर प्रतिबंध लगाकर रोका जा सकता है, और ना ही कोई तंत्र है जिसे ध्वस्त करके समाप्त किया जा सकता है, खाप एक विचारधारा है, जिसे किसी भौतिक तंत्र की जरूरत नही। वह बिना तंत्र के भी एक व्यक्ति के भीतर तंत्र के रूप में जिदा रह सकती है। इसीलिए खाप को एक सामाजिक समस्या की तरह देखा जाना चाहिए। जिसके हल वैधानिक, राजनैतिक के साथ साथ सामाजिक होगे। अकेले वैधानिक या राजनैतिक हल खाप के लिए अपर्याप्त होगें।
 यह सच है कि किसी भी समस्या को हल करने में राजनैतिक और वैधानिक पक्ष महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, लेकिन वो उस समस्या के लिए पूर्ण हो जरूरी नहीं। इसीलिए जब मसले सामाजिक समस्या के हो तो उनके हल भी सामाजिक खांचों में खोजने की जरूरत पर बल देने की जरूरत होती है। वरना उस और किए गए सारे राजनैतिक और सामाजिक प्रयास सफेद हाथी सरीखे होते है। देहज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, महिलाओं की सुरक्षा पर बने कानून इनके गवाह हैं, इन पर बने तमाम कानूनों के बाद इन समस्याओं में सुधार नाम मात्र का हुआ है। ऐसे में हमें खाप पंचायत से इस लड़ाई को कानूनी, राजनैतिक के साथ साथ सामाजिक पृष्ठभूमि में खीचने की जरूरत है। जहां से इस लड़ाई को उस हर युवा तक लेकर जातने की जरूरत है जो खुद की सामाजिकता और सामाजिक जवाबदेही इस विचारधारा को बनाए रखने में रखता है। उसे इस विचार धारा के खिलाफ करने के तक लड़ना होगा। और यह सिर्फ छोटे छोटे विरोधों से ही स्थापित हो सकता है। इन विरोधो के लिए हमें किसी बड़े राजनैतिक मंच की जरूरत भी नही होगी। इसकी शुरूआत छोटे छोटे घरो से करनी होगी, और ये विरोध लगातार होने चाहिए। इस तरह के छोटे छोटे विरोधो से इन अलोकतांत्रिक संगठनो को बड़ी गहरी चोट पहुचती है। उदा. के लिए सर पर दुपट्टा ना रखना आधुनिकता का परिचायक है, जिसने समाज में काफी कुछ बदला।
 इन परिस्थितियों में युवाओ का विरोध जिसमें बदलाव की क्षमता है उनकी जिम्मेदारी और बढ जाती हैं क्यों कि जो बीत गया वो बीत चुका हैं पर हमें जिस समाज में रहना हैं उसका निर्माँण खुद करना होगा ताकि समाज जिन अपराधों को देखे -अनदेखे में लगातार बढावा देता आ रहा हैं उस बढावें को एक करारा धक्का लग सकें। मजूबत लोगों ने कमजोरो के अधिकारों को सहर्ष नहीं दिया है बडी लडाईयां लडनी पडी हैं। इतिहास साक्षी है हर लड़ाई का। कई चेहरे है इन लडाईयों के। जब भी उनका अधिकार खिसके हैं, तो मजबूत वर्ग द्वारा अपराध ही कियें गए है। ऐसे में दमनकारी विचारधारा को पहचान कर उसका लोकतांत्रिक विरोध करने का वक्त हैं। इसलिए इस जब आम आदमी पार्टी ने एक बार फिर से खाप के मुद्दे को चर्चा में ला दिया हैं, तो विमर्श विचारधारा पर केंद्रित कर लड़ाई को आगे ले जाने की जरूरत पर बल देने की जरूरत है ना कि तंत्र को वैधानिक नियमों के तहत तंत्र को प्रंतिबधित करने की आधी अधूरी मांग कर के खुद की जीत मनाने का।

शिशिर कुमार यादव

रविवार, 20 अक्तूबर 2013

व्यक्तिगत अपराध और सामाजिक अपराध का अंतर...

महिला अधिकार और सामाजिक अपराधों पर सजा के निर्धारण में अपराध की प्रकृति एक बार फिर चर्चा का विषय है। हर बार की तरह इस बार भी वजह सकारात्मक नहीं, वरन नकारात्मक ही हैं। वजह हैं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देश के मशहूर तंदूर हत्याकांड में आरोपी सुशील शर्मा की फाँसी की सजा को उम्र कैद में बदलने के पीछें दी गई वजहें। महिला अधिकारों की चर्चा का इतिहास देखें तो हम पाते हैं कि देश में महिला अधिकारों से जुडी यह चर्चा तब जोर पकडती है, जब समाज में महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों का कोई वीभत्स स्वरूप हमारें सामने उदाहरण के रूप में आ जाता हैं। उदाहरण के लिए 16 दिसम्बर 2012 की घटना जिसने ना केवल देश की राजधानी को हिलाया वरन पूरे देश को महिलाओं के विषय में चर्चा करने पर मजबूर कर दिया। जबिक देश में इस घटना से पूर्व भी तमाम बलात्कार महिलाओं के साथ होते रहे थे, और इस घटना के बाद भी हो रहे है, पर हम हर बार की तरह फिर से किसी वीभत्स घटना का इंतजार कर रहे हैं ताकि इस ओर एक बार फिर से चर्चा कर सकें।

सुशील शर्मा केस पर सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के उस आदेश को बदल दिया जिसके तहत अपराधी को फाँसी की सजा दी गई थी। इस निर्णय का आधार यह हैं कि अदालत ने, अभियुक्त के द्वारा किए गए अपराध को, व्यक्तिगत रिश्तों में उपजी निराशा और शक को कारण माना, और कहा कि इस अपराध को सामाजिक अपराध और दुलर्भतम अपराधों में नहीं आँका जा सकता हैं। क्योंकि वह अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था, और रिश्तो में उपजे शक के कारण भावावेश में उसने ऐसी घटना को अंजाम दे दिया था।


इस निर्णय के बाद तमाम बुद्धजीवियों, सामाजिक विज्ञानीयों और गणमान्य लोगों ने विभिन्न मंचों से अपनी अपनी राय रखी। इस निर्णय की आलोचना और पक्ष में मत भी दिए, पर यहाँ हमारा उद्देश्य अदालत के निर्णय की समीक्षा या आलोचना करना नही हैं और ना ही खुला सामाजिक ट्रायल करना है। हम यहाँ आप सब का ध्यान महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों की प्रकृति कारण और विवेचना की ओर खीचने की जरूरत पर बल देना चाहते हैं जिन सवालों पर इस निर्णय का सीधा सीधा प्रभाव पडेगा और उस ओर लड़ी जा रही तमाम लड़ाईयों को धक्का पहुचेगां।
महिलाओं के साथ बदलती घटनाओं में वीभत्सता के बदलते स्वरूप का स्पष्ट ईशारा है कि हम जिस सामाजिक औऱ राजनैतिक ढाचें को ढो और पास पोल रहे हैं, उसमें हम आधी दुनिया की भागीदारी निभाने वाली स्त्री के मूल भूत अधिकारों को, जिसमें जीने, चलने, चुननें, पहननें, बोलने के अधिकारों को, सभ्यता के हजारों साल आगे आने के बाद भी बर्बर तरीके से चलाते आ रहे हैं। हम आज भी प्रतीकों की भाषा से अपने आप को सभ्य घोषित करने पर तुले हैं लेकिन सच ये हैं कि आज भी हम बर्बर और असभ्य हैं। जिनमें प्रेम, भरोसा, रिश्ता, इज्जत, नैतिकता, संस्कृति प्रमुख शब्द के आवरण में महिलाओं के प्रति अपराधों को नए नए स्वरूपों में गढते हैं और उनके प्रति अपराधों की नई विवेचना करते हैं। प्रेम की जिस नई परिभाषा के साथ सुशील शर्मा के कृत्य को सामाजिक अपराध नहीं आँका जा रहा हैं वह हमारी एक भूल नहीं, वरन पहले से चली आ रही अवधारणा को दुहराना भर है। हम इसे व्यक्तिगत अपराध मानकर पितृसत्ता की उस अवधारणा को सही ठहरा रहे हैं, जिनमें ना केवल खाप पनपते हैं बल्कि फलते- फूलते हैं।

समाज इन्ही शब्दों के सप्तदर्शी घोड़ो पर सवार होकर महिला अधिकारों को ना केवल नियंत्रित करता हैं वरन दंडित करता हैं। सुशील शर्मा का केस तो अदालत की चौखट पर चढा भी, पर  ना जाने कितने ऐसे केस जिन्हें सामाजिकता औऱ नैतिकता की चिता पर हमेशा के लिए सुला दिया गया, और समाज ने उन खबरों को इस तरह पचाया जैसा कि वो उनकी सामाजिक जिम्मेदारी थी। ऐसे तमाम वाक्यें हमारी और आप की जिंदगी के करीब से गुजरे हैं, पर हम आप उसे मौन की चादर में लपेट कर चुपचाप इस तरह के अपराधों को अपनी स्वीकृति देते रहे हैं।
समाज ने इस बर्बरता को जिंदा रखनें के लिए चरणबद्ध तरीको से जाल बनाए हैं। जिसमें परिवार फिर समाज और फिर अपराध की श्रृखला है। इन्ही जालो में नारी कहीं ना कही फँसी रहती है, और अगर किसी एक से बच भी जाए तो दूसरे में उसे उलझ जाएं। इस प्रकार के जालों से बच कर निकलने के दौरान फसने की बड़ीं कीमत चुकानी पड़ती है। जिसकी कल्पना करना सच में हम जैसे असभ्य और बर्बर लोगों के लिए इतनी आसान भी नहीं है। जिस पर गुजरती है वो इस हालात में पहुच जाता है कि वो इसका सहीं आकलन नहीं कर सकता है। सामान्यतया या तो वे जिंदगी की जंग हार जाते हैं और अगर बच जाते हैं तो हम और आप उनका बहिष्कार इन्हीं चरण बद्ध जालो के अन्तर्गत कर देते हैं।
  
हम जिस देश में रह रहें हैं उसमें इस अपराध की प्रवृत्ति और चरण को सामाजिक और राजनैतिक मान्यता की अदृश्य शक्ति मिली हुई है। हम और आप इन्हे पहचानते और जानते भी हैं औऱ कई बार हिस्से भी होते हैं पर बदलते नहीं हैं। इनकी गर्जना तब और सुनाई पड़ने लगती हैं जब इस तरह के हादसें हम आप के करीब से गुजरते हैं। इस दौरान इनकी प्रतिक्रिया पर नजर डालने भर मात्र से इन ताकतो और चेहरों को आसानी से पहचाना जा सकता है। दिल्ली के इस मामले के बाद समाज और सार्वजनिक मंचो से बयान उसकी बानगी भर थे। ऑनरकिलिगं को भावनात्मक और सामाजिकता से जुड़ा मुद्दा माननें वाले औऱ चुपचाप भ्रूण हत्या को बढावा देने वाले समाज से, इस हत्या पर ईमानदारी भरी प्रतिक्रिया औऱ बदलाव की उम्मीद करना कहां तक समझदारी भरा कदम होता, तो यह प्रश्न आप जैसे विद्वानों की बौद्दिक जुगाली के लिए छोड़ता हूँ।

मैं यहाँ सुशील शर्मा को फाँसी की सजा को बरकरार रखने की वकालत नहीं करता, बल्कि फाँसी दिए जाने की राजनीति के कारण किसी भी प्रकार की फाँसी दिए जाने का विरोधी हूँ लेकिन अदालत द्वारा सुशील शर्मा के केस को सामाजिक ढाचों से इतर रख कर उसकी व्याख्या व्यक्तिगत अवधारणा के आधार पर करने के खिलाफ हूँ। सुशील शर्मा द्वारा उठाय़ा गया कदम उसी सामाजीकरण और पित्तृसत्ता की संरचना में अपराध की हिस्सा था उससे इतर कुछ नहीं। निश्चित ही कोई भी समाज या व्यवस्था आदर्श नहीं होती हैं, अच्छे और बुरे गुण सभी सामाजिक व्यवस्था के हिस्से होते हैं। भारतीय सामाजिक व्यवस्था उससे इतर नहीं हैं, लेकिन फिर भी  महिलाओं के प्रति समाजीकरण की वो व्यवस्था जिसमें उनके प्रति अपराधो जो कि सामाजिक अपराध हैं और समाज का हिस्सा रही है। उन्हें व्यक्तिगत मान लेना उचित नहीं होगा। इनका इतिहास बर्बर काल सें हैं और आज भी अनवरत जारी हैं। आज भी हम ऐसे ही समाज को पाल पोस रहे हैं जो महिलाओं के अधिकारों के प्रति पूर्णतया असंवेदनशील है। इस कदर की असंवेदनशीलता और अपराध को बढावा देना किसी भी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं होता है।

शिशिर कुमार यादव 

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

बिट्टी जिसे जिंदा भूत निगल गए

सालों बीत जाने के बाद भी स्त्री सघर्ष की हर लड़ाई में वह चेहरा याद आ जाता हैं. ना जाने कितनी बार वहीं सवाल मन में उठता हैं कि जो इतना चुप रहा करती थी, वो इतना बोलने कैसे लगीं, और जब शांत हुई, तो चीखों के साथ, जिसकी आवाज किसी के कानों तक ना पहुची। जी हाँ वह एक रहस्मयी मौत मार दी गई। बिट्टी ( अवध प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में लड़कियों के लिए सम्बोधन) जिसे मैं जानता था, उस बिट्टी ने पगली तक का सफर कब तय कर लिया किसी को खबर नही. हाँ सहयोग सबने किया और सबसे ज्यादा सहयोग उन्होनें किया, जिन्हें वो अपना ही मानती थी.

दिसम्बर 2009 में दिल्ली से पत्रकारिता का पहला सेमेस्टर पूरा कर जब घर लौटा तो, पूछा कि कुछ नया ? तो छोटी बहन ने लगभग चिंतित स्वर में कहा अरे जानता है वो बिट्टी हैं ना पागल हो गई है, बहुत बोलने लगी है, किसी से भी बात करने लगती है, उसके घर वालों का कहना है कि उसे भूत लग गए हैं. खैर बहन ने खुद ही बात को काटते हुए कहा कि भूत - वूत कुछ नहीं, 15-16 साल की लड़की की शादी एक अधेड़ से कर दी तो पागल नहीं होगी तो क्या होगी ? मैंने  जब उसके जवाबों में अपने सवालों की उत्सुकता जोड़ी, तो संकोच भरे शब्दों में उसने कहा अरे  28 साल का लड़का एक लड़की के साथ जबर्जस्ती ही करेगा ना और वो थी भी तो थोडी सीधी, लड़की तो थी ही नहीं सिर्फ घर का काम करती थी. कितना काम करती थी, है ना ?”
अपनी बात को बल देने के लिए बहन ने मेरी ओर सवाल उछाल दिया था. (हमारे गांवो में घर के काम में पशुओं की देखभाल प्रमुख हैं जो सबसे बडा काम है). बहन अपनी बात में और जोड़ती हैं कि अब ससुराल वाले कहते हैं कि वो काम ही नहीं करती, शायद गर्भ से भी थी पर ठहरा नहीं तो अब वो उतना एक्टिव नहीं रहती और उसका मन भी नहीं लगता तो उसके ससुराल वाले उसे भूत चढने का बहाना कर गाँव छोड गए हैं, और गाँव वाले उसे चिढा चिढा कर परेशान करते हैं, ऐसें में वो थोड़ी सी मेंटल डिस्टर्ब हो गई, तो गाँव वाले उसे पगली कहने लगें. वो ना भी हो तो उसे पागल कर देगें. बहन ने लगभग एक सामजिक विज्ञानी की तरह पूरे कारण सहित व्याख्या कर डाली थी. मैं भी उससें पूर्ण सहमत था पर दोष और दोषी खोज लेने भर से बिट्टी को देने के लिए हमारे पास कुछ ना था.
खैर गाँव पहुचते ही बहन की हर बात अक्षरश: सही थी, बिट्टी बहुत बोलती पगली में बदल चुकी थी, चचेरे भाई ने मेरे सामने प्रमाण देने के लिए उसके पति का नाम ले लिया और वह शुरू हो गई गालियाँ देने. किसी ने कहा मैं भी हूँ तो आवाज में नरमी के साथ मेरी ओर बढ आई, लगभग पैर छूते हुए पूछा भईया कैइसे हय”? जवाब की प्रतीक्षा किए बगैर घर में सब का हाल पूछ गई। मैं लगभग संशकित भाव से और थोडा सा असहज हो कर उसके सवाल को सुनता रहा। शायद मैं भी डर रहा था। बिट्टी हर सवाल चमकती आँखों से पूछ रही थी जिसमें बार बार एक ही सवाल था कि मेरी हालातों की वजह क्या है ? पर आस पास सवालों पर उठती हँसी उसके हौसले को तोड़ देते हैं और वो उदास भाव से अपने जवाब को लिए बिना ही बड़वडाती चली जाती हैं । 

इतनी सक्षिप्त मुलाकात के एक साल बाद खबरों में सुना की उसने खुद को आग ली. उसकी मौत भी एक रहस्य थी, वो जल कर मरी थी और 10 से 15 मीटर बाहर बैठे लोगों को उसकी चीखे तक नहीं सुनाई दी थी. सबको धुआँ उठने तक का इंतजार करना पड़ा था, पर हाँ वो मर जरूर गई थीं. उसके मरने पर काफी सवाल थे, जो समय के साथ खत्म होते चले गए. गांव के जिम्मेदार लोगों ने पुलिस केस से बचा कर उसको अंतिम यात्रा पर भेज अपने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली. सब विस्मित थे. शायद सब को सवालो के जवाब पता था पर जवाबदेही  के साथ उन सवालो के जवाब कोई नहीं देना चाहता था. कोई भी उन सवालों की ओर ध्यान नहीं दे रहा था जिन सवालों को बिट्टी ने हर दिन हर उस इंसान से पूछा, कि मेरी ये हालत क्यों हैं? वो हर इंसान से यही कहती तुमने तो मुझें देखा हैं मैं ऐसी तो ना थी, फिर मेरे ऐसे होने की वजह क्या हैं ?
आज भी वे सवाल जिंदा हैं, क्योंकि किसी ने उन सवालों के जवाब नहीं दिए थें. ऐसे में कोई ना कोई बिट्टी आपके अपने गाँव में आप से इस तरह के सवाल पूछते मिल सकती हैं.उस बिट्टी को तो कोई जवाब नहीं मिला था और शायद अनुत्तरित चेहरों को देख कर वो यहाँ से चली गई. पर उसके सवालो की चीख आज भी बरकरार है. जिसे हम लगभग अनसुना करते आ रहे हैं. खैर जो उसकी जिंदा चीखों को ना सुन सके वो इन सवालो की चीखों को क्या सुनेगें। उन सवालो के जवाब कोई और ना माँग ले इसलिए उन सवालों को पूछने वाले को पगली बना कर अपने समाज से अप्राकृतिक मौत मरने के लिए मजबूर कर दिया और सवालों को पगली के सवालों में तब्दील कर दिया. जब भी स्त्री अधिकारों की बात आती हैं तो मैं ऐसे समाज से स्त्री अधिकारों के लिए मांगू भी तो क्या मांगू जो स्त्रीयों को सिर्फ अप्राकृतिक मौते ही उपहार में दे सकता हैं (बिट्टी की मौत का जिम्मेदार मैं खुद को भी मानता हूँ क्योंकि उस समाज का मैं भी हिस्सा था और हूँ भी.

यह लेख जनसत्ता अखबार में 13 जुलाई 2013 में दुनिया मेरे आगे के कालम में छपा हैं । 


शिशिर कुमार यादव 

शनिवार, 11 मई 2013

मैं, सरकार और गुडें


यादव होने के नाते एक बन्धु ने कहा कि आपकी सरकार में तो खुली गुड्डागर्दी जारी हैं। बस हम लोग इसी चीज से मुलायम और सपा के आने से डर रहे थें, कि खुले आम गुन्डागर्दी का माहौल बन जाएगा इसी का ड़र था, लीजिए जो ड़र था अब सच हो गया हैं। मैं उनसे और उनकी बात से पूरी तरह अक्षरश: सहमत हूँ। विरोध का विकल्प था भी नहीं। पर इन बातो को सोचते सोचते मेरे मन में सिर्फ एक ही सवाल कौध रहा था, कि क्या सच में इस व्यवस्था विकल्प खोजा सकता हैं और अगर है तो क्या?  विकल्प बनाएगा कौन? किससे उम्मीद की जा सकती हैं। ये ऐसे सवाल हैं जिनका जबाव हम आप आसानी से नहीं खोज सकते हैं क्योंकि इन सब सवालों का केवल एक ही जवाब हैं आपकी अपनी नैतिकता जो की ना जाने हम औऱ आप कब की जला कर ताप चुके हैं। तो ऐसी स्थितियों के लिए बचाव लाए भी तो लाए कहाँ सें। आज कोई ज़िया उल हक़ मारा गया हैं कल कोई और मारा जाएगां , पर मारा जरूर जाएगा।
आप सोच रहे होगें कि मैं अति निराशावादी हूँ पर मेरे होने की बडी वजह हैं, जिनके जवाब हम आप दे भी नही सकते। जब विरोध और बदलाव का जब भी मौका आता हैं तो हम और आप जाति वादी से लेकर ना जाने कौन कौन वादी हो जाते हैं, और बदलाव करने से झिझकते हैं। जिस तालाब औऱ जिस भइया की बात हम आप कर रहे हैं वो किसी क्षेत्र में किसी धर्म और जाति के मसीहा होते हैं और जब भी इन्हे बदलने की बारी आती हैं तो हम आप अपने अपने क्षेत्र के मसीहा के रूप में जिंदा रख कर इन्हे जितवाते हैं। बस चेहरे बदल जाते हैं हम कुछ उखाड़ नही पाते हैं। कभी राज ठाकरें, औवेसी, तोगडिया, मोदी, तो कभी मुखिया के रूप में सामने आते हैं, जिनका आप कुछ नही कर सकते और ना ही आपका बना बनाया तंत्र। क्योंकि इस तंत्र के मुखियाँ तो हम आप ने इन्ही को चुन रखा हैं तो ऐसे में ये अपने ही खिलाफ कार्यवाही करवा ले ऐसा कैसे हो सकता हैं, मेरी समझ से बाहर हैं। और जब हम इन्हे बाहर कर सकते हैं तो हम इन्हें ही मसीहा मान कर चुन आते हैं क्योंकि सत्ता और ताकत इन्ही के पास हैं और हम भी इन्ही में अपना हित देख कर खुद को ताकतवर बनाने के लिए इन्ही का चुनान करते रहते हैं। अगर ऐसा ना होता तो सत्ता के केन्द्र में इतने अपराधी कहा से आ गएं हैं। किसी की इतनी हैसियत नही हैं कि वो लोकप्रिय वोट के आधार पर अपने आप को जितवा सके। तो ऐसें में मेरा खुद का मानना हैं कि स्वहित के आगे कोई और हित जिंदा ही कहा रहा हैं। इतिहास की पंरपरा को आज की राजनैतिक पार्टिया अच्छे से भुनाती आ रही हैं. औऱ आज आप और हम सिर्फ अपने गुडें वाली पार्टी का इंतजार कर रहे होते हैं ताकि अपने अपने स्वहित पूरे हो सके. भाजपा .आए तो गुंडें..बसपा आए तो गुडें..सपा आई तो गुडडे तो हम औऱ आप बस अपनी अपनी गुडों वाली पार्टी का इंतजार करते हैं और ये पार्टिया हमारे पंसदीदा गुडें को ढूढ कर हमारे क्षेत्र से चुनाव का टिकट देती हैं ताकि आप अपनी गुडों वाली सरकार को आसीनी से चुन सकें। और हम चुनते भी हैं ना चुनते तो आते कहाँ से हर पार्टी में ।
उत्तर प्रदेश में बड़े आला अफसर हैं (नाम नही ले रहा हूँ )...लेकिन वो कहते कहते कह गए कि जिस जिले में ये घटना हुई हैं, वहाँ जो उत्तर प्रदेश से जुड़े हैं वो जानते हैं कि कैसे हालत कैसे रहे हैं या वहाँ का इतिहास कैसा हैं ..खैर हिचकते हुए ही सही उन्होनें ये माना कि राजनीति का अपराधीकरण इस हद तक हुआ हैं कि अपराधी ही नेता हैं.। जिनका कुछ नही किया जा सकता हैं। तो ऐसें में आप उम्मीद किससे कर सकते हैं। समस्या केवल सिर्फ इस सरकार से नही, बल्कि, यह तो सत्ता का चरित्र ही बनता चला जा रहा हैं और देश की राजनीति इसी तरह चल रही है। बाहुबली, बलात्कारी, भ्रष्ट-दबंग नेता कमोबेश सभी सरकार में होते हैं
रवीश की रिपोर्ट में कानपुर से लेकर लखनऊ के थानेदारो में यादवों की संख्या पर प्रकाश डाला गया और बताया गया कि ये आकडें हैं... पर रवीश को कौन बताएं...कि माया सरकार में यादव होना ही गुनाह था  अगर थोडी तहकीकात करें तो पाएगें कि जितने यादव आज दिखते हैं, वो माया सरकार में या तो बंगाल की खाडी में थें या रवीश ही खोज सकते हैं.. और इस सरकार में भी किसी एक जाति के लोग हासिएँ पर हैं, और अगली सरकार में ये लोग जो अभी आकडे बने हुए हैं वो हासिएँ पर होगें।. खैर तो साहब हित के आगे आपका अपनी गुडों वाली सरकार हैं बस और कुछ नहीं...

शिशिर कुमार यादव
shishirdis@gmail.com

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

हम अब भी बर्बर और असभ्य हैं...


सुबह 3 बजकर 38 मिनट का समय और लैपटाप पर चल रही खबर पर नजर क्या पडी दिल बैठ गया। पिछले कई दिनों से देश भर में, समाज द्वारा महिलाओं के प्रति अपराधों के घिनौने चहरे  पर  एक चर्चा और माहौल हैं। जिसे हम और आप महिला अधिकारों और महिला अस्मिता का प्रतीक मान कर लड़ रहे थे वो अब नहीं रहीं। यानी दिल्ली में हुए बलात्कार के बाद 23 वर्षीय छात्रा की सिंगापुर में मौत हो गई। मेरे शब्द और लेखन शक्ति उस नायिका के प्रति क्या प्रदर्शित करें यह मेरे लिए कठिन बन पड़ा। सच कहूँ  तो मैं उसकी मौत के बाद शर्मिदा हूँ कि मैं उस समाज का हिस्सा हूँ, जिसमें एक महिला अपनी प्राकृतिक जीवन यात्रा इसलिए पूरी नहीं कर सकी क्योंकि समाज नहीं चाहता था कि वो इस तरह सें जिए।

इस खबर के बाद दोष और सामाजिक सामाजिक औऱ राजनैतिक निहतार्थ निकाले जाएगें, जिसकी अपनी अपनी प्रकृति और सीमा होगीं। लेकिन फिर भी इस हत्या, जिसे हम और आप ने बडे सधे तरीके से की हैं उस और सोचना जरूरी हैं कि क्या सच में हम एक सभ्य समाज में हैं? क्या सच में हम ऐसा ही समाज चाहते हैं? इस मौत को क्या कहा जाएहादसा, अपराध, दुर्घटना या कोई और शब्द। शायद किसी भी शब्द में इतनी ताकत हो जो  इसे पूरी तरह विश्लेषित कर सकें । सच में आज लगा कि भाषा मूक है, जिसमें बधते ही इस तरह के हादसे (हादसे लिखने के लिए माफी क्योंकि यह हादसों की परिभाषा से बहुत गंभीर विषय हैं) अपनी गंभीरता और विभत्सता का मौलिक मूल खत्म हो जाता हैं। सच में, जैसे ही हम इस तरह के हादसों को भाषा या शब्द में बाधते हैं तो हम इस हादसे को कम आँक बैठते हैं। इस तरह के हादसों की गंभीरता और विभत्सता शायद ही मानव मस्तिष्क आंक पाएं। अगर आँक पाता तो इस तरह के अपराध तो कत्तई न करता। कुछ लोग मौत को इसका अंतिम छोर मानते हैं और अपराधी को मौत की सजा देकर इसकी विभत्सता की सजा को पूरा करना चाहते हैं। मौत जिसे आज भी रहस्य माना जाता हैं वो भी इस तरह के हादसों के लिए पड़ाव हैं ना कि पूर्ण। यह बात इस बात से और भी सिद्ध होती हैं कि अगर मौत इस तरह के हादसों के लिए पूर्ण होती तो मौत के बाद अपराधी और समाज दोनो ही इसकी पुनरावृत्ति नहीं करते। इन हादसों की पुनरावृत्ति हमें यह बतलाती हैं कि अब भी हम इन हादसों की ना तो गंभीरता समझ पाए हैं और ना ही विभत्सता। कई बार पीडित खुद भी मौत का शिकार हो जाते हैं जैसा कि इस मामले मे हुआ हैं, जहाँ पीडिता जिंदगी से अपनी जंग हार गई । 
जो भी हो पर इस हादसे ने हमें एक बार खुद की ओर सोचने के लिए झकझोरा हैं कि हम किस सामाजिक औऱ राजनैतिक ढाचें को ढो और पास पोल रहे हैं। जिसमें हम आधी दुनिया की भागीदारी निभाने वाली स्त्री के मूल भूत अधिकारों को, जिसमें जीने, चलने, चुननें, पहननें, बोलने के अधिकारों को हम सभ्यता के हजारों साल आगे आने के बाद भी बर्बर तरीके से चलाते आ रहे हैं और हम खुद को सभ्य होने का दावा करने की होड़ मे लगें हैं। हम आज भी प्रतोकों की भाषा से अपने आप को सभ्य घोषित करने पर तुले हैं लेकिन सच ये हैं कि आज भी हम बर्बर और असभ्य हैं।
समाज ने महिलाओं के प्रति इस बर्बरता को जिंदा रखनें के लिए चरणबद्ध तरीको से जाल  बनाए हैं। जिसमें परिवार फिर समाज और फिर अपराध की श्रृखला हैं। इन्ही जालो में नारी कहीं ना कही फसी रहती हैं और अगर किसी एक से बच भी जाए तो दूसरे में उसे उलझ जाएं। इस प्रकार के जालों से बच कर निकलने के दौरान फसने की बड़ीं कीमत चुकानी पड़ती हैं। जिसकी कल्पना करना सच में हम जैसे असभ्य और बर्बर लोगों के लिए इतनी आसान भी नहीं हैं। जिस पर गुजरती हैं वो इस हालात में पहुच जाता हैं कि वो इसका सहीं आकलन नहीं कर सकता हैं। सामान्यतया या तो वे जिंदगी की जंग हार जाते हैं और अगर बच जाते हैं तो हम और आप उनका बहिष्कार इन्हीं चरण बद्ध जालो के अन्तर्गत कर देते हैं।
   
हम जिस देश में रह रहें हैं उसमें इस अपराध की प्रवृत्ति और चरण को सामाजिक और राजनैतिक मान्यता की अदृश्य शक्ति मिली हुई हैं। हम और आप इन्हे पहचानते और जानते भी हैं औऱ कई बार हिस्से भी होते हैं पर बदलते नहीं हैं। इनकी गर्जना तब और सुनाई पड़ने लगती हैं जब इस तरह के हादसें हम आप के करीब से गुजरते हैं। इस दौरान इनकी प्रतिक्रिया पर नजर डालने भर मात्र से इन ताकतो और चेहरों को आसानी से पहचाना जा सकता हैं। दिल्ली के इस मामले के बाद समाज और सार्वजनिक मंचो से बयान उसकी बानगी हैं। ऑनरकिलिगं को भावनात्मक और सामाजिकता से जुड़ा मुद्दा माननें वाले औऱ चुपचाप भ्रूण हत्या को बढावा देने वाले समाज से, इस हत्या पर ईमानदारी भरी प्रतिक्रिया औऱ बदलाव की उम्मीद करना कहां तक समझदारी भरा कदम होगा, यह प्रश्न आप जैसे विद्वानों की बौद्दिक जुगाली के लिए छोड़ता हूँ। इस मामले में भी सामाजिक और राजनैतिक बयानवीरों ने इसी कड़ी को जिंदा रखा था जिसमें पीड़ित स्वत अपने प्रति हुए अपराध के लिए दोषी थी।

समाज संस्कृति के उद्घोषक जो इस देश को कोस कोस पर बदले पानीचार कोस पर बानी से विविधता भरी संस्कृति का वर्णन कर अपना सीना चौडा करते हैं। वो कभी ये नहीं बताते हैं कि महिलाओं को लेकर यह देश पूरी तरह से एक तरह की राय रखता हैं। क्या उत्तर क्या दक्षिण, क्या राजस्थान या बंगाल, क्या शिक्षित क्या अशिक्षित, महिलाओं के प्रति अपराध और उनके अधिकारों के प्रति हमारा रवैया लगभग एक सरीखा औऱ एक समान हैं। देश का कोई कोना दंभ और दावा नही भर सकता हैं कि वो इन स्थितियों और परिस्थितियों से अपने को इतर रखे हुए हैं। स्पष्ट हैं कि महिलाओं के प्रति नजरिये को लेकर आजतक हमारा समाज जहां था वहीं हैं और अगर कुछ भी बदलाव के पद चिन्ह दिखलाई भी पडे हैं तो उन्हे कुचलनें के लिए समाज ने अपराधियों को हमेशा बढ़ावा दिया हैं। जिससे उनकी नैतिकता और सभ्यता की खोखली पाठशाला का पाठ महिलाएं आसानी से समझ लें। आज भी समाज, नारी देह और उसकी स्वतत्रता को अपने पैमानो पर देखता हैं और आगे भी उसे नियत्रित करने का प्रयास जारी हैं, इन कोशिशों में अपराधी को और अपराध को मौन सहमति देकर आगे भी नियत्रिंत करना चाहता हैं। इसीलिए सामाजिक व्यवस्था का कोई भी परिवर्तन, आज भी अलोकतात्रिक तरीके से ही कुचला जाता हैं। राजनैतिक और सामाजिक संस्थाए इनको न केवल बढ़ावा देती हैं वरन कई बार अगुवाई करती नजर आती हैं।

निश्चित ही कोई भी समाज या व्यवस्था आदर्श नहीं होती हैं, अच्छे और बुरे गुण सभी सामाजिक व्यवस्था के हिस्से होते हैं। भारतीय सामाजिक व्यवस्था उससे इतर नहीं हैं, लेकिन फिर भी  महिलाओं के प्रति समाजीकरण की वो व्यवस्था जिसमें उनके प्रति अपराधो जो कि सामाजिक अपराध हैं और समाज का हिस्सा रही है। इनका इतिहास बर्बर काल सें हैं और आज भी अनवरत जारी हैं। आज भी हम ऐसे ही समाज को पाल पोस रहे हैं जो महिलाओं के अधिकारों के प्रति पूर्णतया असंवेदनशील हैं।इस कदर की असंवेदनशीलता और अपराध को बढावा देना किसी भी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं होता हैं। ऐसे में हमारा दावा कितना खोखला हैं कि हम एक सभ्य समाज में हैं और हमारे द्वारा एक सभ्य समाज का निर्माण किया जा रहा हैं।

शिशिर कुमार यादव

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

विरोध की प्रयोगशाला राजपथ नहीं आपका अपना घर होना चाहिए

बीते हफ्ते दिल्ली में हुए 23 वर्षीय छात्रा के बलात्कार के बाद दिल्ली में बलात्कार के विरोध में एकाएक जनता सड़क पर उतरी। जिसमें युवाओं की बड़ी भागीदारी दिखी। सड़क पर उतरी जनता ने इस अमाननवीय कृत्य का पुरजोर विरोध किया गया। जिसने सरकार की चूल्हें हिला कर रख दी। इस विरोध ने राज्य सरकार क्या केन्द्र सरकार के प्रमुख जिम्मेदार ओहदे पर बैठे लोगों को अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही के लिए मजबूर किया। इस विरोध के बाद महिलाओं की सुरक्षा और उनके सार्वजनिक जगहों पर अधिकार को लेकर सभी मंचो पर एक चर्चा का माहौल बना। इस माहौल को ना तो गुजरात के मोदी का जादू ही धूमिल कर सका और ना ही क्रिकेट के भगवान सचिन तेदुलकर का एकदिवसीय क्रिकेट से सन्यास। इस विरोध ने इस महत्वपूर्ण चर्चा को जिंदा रखा जो आमतौर पर इतनी बडी खबरों के बाद स्वत: ही दम तोड़ देती है।               

ऐसा नहीं हैं कि बलात्कार इस देश में पहली बार हुआ था या सरकार का विरोध पहली बार हो रहा हैं। लेकिन फिर भी यह जनाक्रोश अपने आप में काफी अलग था। जिसने दिखाया कि ने अगर इस देश के हालात में कुछ बदलाव आ सकता हैं वो सिर्फ और सिर्फ युवाओं के विरोध से बदल सकता हैं, क्योंकि छात्रों और युवाओं का एक मात्र विरोध बचा हैं जो लोकतांत्रिक देश में एक परिवर्तनकारी शक्ति रखता हैं और पवित्र हैं। यह विरोध हालातों में और महत्वपूर्ण हो जाता हैं जब राजनीति और महत्वपूर्ण विरोध की आवाजों में धर्म, जाति, क्षेत्र और वर्ग का असर साफ झलकता हैं। ऐसें मे युवाओं का यह ईमानदारी भरा विरोध सच में अपने आप में क्रांतिकारी होता जाता हैं। इन स्थितियों में युवाओं की जिम्मेदारी और भी बढ जाती हैं कि वो किसी भी विषय को सहीं से समझें ही नहीं वरन अपनी आवाज सामाजिक न्याय और कमजोरो के लिए उठाते रहें।

विरोध के बाद से कुछ परिवर्तन होना तय तो हैं, लेकिन ये लड़ाई यहीं खत्म नहीं हो जाती हैं। अभी भी महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई बडी लम्बी हैं क्योंकि इस विरोध सें हम कानून के नियमों में परिवर्तन तो करा ले जाएगें, अपराधियों को दंड भी दिला दे जाएगें, लेकिन उस संस्कृति का क्या करेंगें जिसने इस तरह के अपराधों की पौध को खुद ही सीचा और बड़ा कर रखा हैं। सबसे बड़ा सवाल यह हैं कि समाज इस तरह के अपराधों से पीड़ित छात्रा को कहाँ तक जीने देगी ? समाज का एक वर्ग जहां विरोध कर के परिवर्तन करने की मांग कर रहा हैं वहीं दूसरी और देश के हर कोने में बलात्कार, भ्रूण हत्या और महिलाओं के प्रति अपराध जारी हैं। इस घटना के अगले ही दिन बिहार और तमिलनाडु में हुए बलात्कार के बाद हत्या की घटनाए इस पर मोहर लगाती हैं। ऐसे में यह सवाल अपने आप में एक कठोर कानून कहाँ तक महिलाओं और उनके अधिकारों को सुरक्षित कर सकेगा। जबकि समाज महिलाओं के प्रति अपनी सामंती और पित्रृसतात्मक सोच से बाहर निकलने के लिए तैयार ही नहीं हैं। जिस समाज में महिलाओं से जुडे अपराधों में महिलाओं को अपराधी बनाने की प्रवृत्ति प्रमुख हैं, उस समाज में सिर्फ इंडिया गेट का विरोध कहाँ तक कारगर होगा। मेरी चिंता तब और बढ जाती हैं जब महिला को ही उनके साथ हुए अपराध के लिए दोषी ठहरा दिया जाता हैं। महिला के साथ हुई घटना के बाद, जगह घटना की जगह, वक्त उनका पहनावा और उसका उस वक्त उस जगह होने का कारण प्रमुख हो जाता हैं। तो ऐसे में यह विरोध सिर्फ अपराधी और कठोर कानून के अलावा क्या महिलाओं को एक समाज में लोकतांत्रिक जगह दिलाने में सक्षम हो पाएगा ? इस पर मुझें शक हैं। मेरा शक उस वक्त और बढ जाता हैं जब समाज में महिलाओं का घरों में रह कर विरोध करने का भी अधिकार सुरक्षित नहीं दिखाई पड़ता हैं। तो ऐसें में उनका सड़क पर वक्त बेवक्त चलनें के अधिकार और सार्वजनिक जगहों पर समान भागेदारी की कल्पना करना दिन मे दिवास्वप्न देखने सरीखा नहीं होगा ?

हम समाज के उस नजरिए का क्या करेगें जो अस्पताल में लड रही पीडित के लिए मर जाने को बेहतर विकल्प मान ररहें हैं। क्योंकि अगर वो बच जाती हैं तो उसका जीवन नर्क हो जाएगा औऱ इस नर्क के पीछें का तर्क डॉक्टरों का बयान जिसमें उसके इन्फेक्सन और मातृत्व सुख ना प्राप्त कर पाने का हवाला हैं। जिसमें उसके वैवाहिक जीवन और मातृत्व सुख की कल्पना और कठिनाईयों को केन्द्र में रखा जा रहा हैं। ऐसे में उस पीडित की लडाई कितनी कठिन और कितने मोर्चों पर होगी इसका आकलन करना आसान न होगा। ऐसे हालातों मे क्या उस पीडित की अपनी मौत से लडी और जीती हुई लडाई काफी छोटी न हो जाएगी, जब उसे हर कदम पर अपनें ही समाज में अपने ईर्द गिर्द के लोगों को खिलाफ लडना होगा ।

ये वो सवाल हैं जिनके बारे में हमें सिर्फ चर्चा करनी हैं पर उस पीडित को लडना होगा। वैवाहिक जीवन और मातृत्व के सुख की चिन्ता हमें हमारे उस समाज का असली चेहरा दिखलाता हैं जिसमें जहाँ स्त्री की उपयोगिता विवाह तक सीमित हैं और जहाँ वो बच्चें पैदा करने की मशीन भर हैं। तो ऐसें में जब यह पीडित अपनी मौत से जीत कर बाहर आएगीं तो क्या समाज उसके सामनें कई विषद लडाईयां लड़ने के लिए मैदान तैयार नहीं कर देगा जिसमें समाज पीडित को अयोग्य घोषित कर देगा, क्यों कि वो विवाह और मातृत्व सुख प्राप्त करने लायक नहीं रह जाएगीं। इस लडाई में पीडित को अपनी उपयोगिता साबित करनें के लिए उसे अपनी सारी जिंदगी लडना होगा ? वो हाथ में थाली लेकर अपने आप को समाज रूपी बाजार में खुद को प्रस्तुत तो कर ना सकेगी और किसी समाज दूसरे रूप में उसें स्वीकार भी नहीं करेगा। मातृत्व सुख ना पा पाने की स्थिति में क्या समाजिक संस्थाएं उसका स्वत: तिरस्कार ना कर देगीं ? ऐसें में इंडिया गेट से लेकर राजपथ तक विरोध का असर कहां तक प्रतिफलित होगा यह एक बडा सवाल हैं ? 

तो ऐसें में क्या हम इस विरोध से सिर्फ और सिर्फ अपराधी को सजा और अपराध के लिए कानून के लिए नहीं लड रहें हैं। क्या अपराधी को मौत की सजा और कानून के बाद हमारें कर्तव्यों की इतिश्री हो जाएगीं ? क्या हम इस विरोध में सामाजिक गैरजिम्मेदारी औऱ राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव को अनदेखा नहीं कर रहे है। जो इनका मूल हैं। सच में कानून लैण्डमार्क तय कर सकता हैं पर पूरा रास्ता नहीं। जो रास्ते तय कर रहें हैं वो नारी देह को आजाद करने के लिए तैयार ही नहीं हैं। तो क्या हमारी लडाई की दिशा अधूरी नहीं हैं। हम किस ओर लड़ रहे हैं यह एक महत्वपूर्ण सवाल हैं। हम लगातार असली जड़ को लगातार अनदेखा किए जा रहे हैं जिनसे हमें सच में लडना हैं। हम कब तक अपराधियों से अपराध के लिए लड़ते रहेगे ? क्या इस विरोध के बाद अपराधी फिर से हम और आप के चहरें से उभर नही आएगें ? इस लडाई से राजनैतिक जिम्मेदारी को एक हद तक जवाबदेह बना लेगें लेकिन सामाजिक जवाबदेही का क्या जो राजनैतिक जवाब देही को भी पूरी तरह प्रभावित करता हैं। सामाजिक जवाबदेही के बिना हमारी लडाई अधूरी ही रह जाएगी और राजनैतिक जवाबदेही को भी बच निकलने का पूरा मौका मिल जाएगा जैसा कि खाँप पंचायतो के मामले में हआ था। 

ऐसें में लडाई सिर्फ कानूनी परिवर्तन के लिए राजनैतिक दबाब के साथ साथ सामाजिक जवाब देही की ओर मोड़ने की भी जरूरत हैं। जहाँ पितृसत्तात्मक समाज के अलोकतांत्रिक नियमों के तलें महिलाएं एक लम्बे दौर से अपने लोकतात्रिक हको का बलिदान करती आ रही हैं। और अगर महिलाओं ने कहीं विरोध उठाने के लिए पहल की वहाँ इस पितृसत्ता द्वारा अपनी दमनकारी निर्णयों और तरीको से इस लोकतांत्रिक विरोध का दमन किया जाता रहा हैं। खुद महिलाओं का भी सामाजीकरण इस तरह किया जाता रहा हैं जहाँ महिलाएं भी महिलाओं के अधिकारो की दुश्मन बनी रही हैं। देहज हत्या, भ्रूण हत्या और अन्तर्जातीय विवाह इनके ज्वलन्त उदाहरण हैं।


इन परिस्थितियों में युवाओ का विरोध जिसमें बदलाव की क्षमता है उनकी जिम्मेदारी और बढ जाती हैं क्यों कि जो बीत गया वो बीत चुका हैं पर हमें जिस समाज में रहना हैं उसका निर्माँण खुद करना होगा ताकि समाज जिन अपराधों को देखे -अनदेखे में लगातार बढावा देता आ रहा हैं उस बढावें को एक करारा धक्का लग सकें। मजूबत लोगों ने कमजोरो के अधिकारों को सहर्ष नहीं दिया हैं। बडी लडाईयां लडनी पडी है। इतिहास साक्षी हैं हर लड़ाई का। कई चेहरे हैं इन लडाईयों के। जब भी उनका अधिकार खिसके हैं, तो मजबूत वर्ग द्वारा अपराध ही कियें गए है। ऐसे में दमनकारी नीतियों का एक लोकतांत्रिक विरोध करने का वक्त हैं। इसके लिए सबसे पहलें हमें अपने घर में आवाज उठाने की जरूरत हैं, वहाँ के नियमो को ना सिर्फ तोडना हैं वरन फिर से लिखने की जरूरत हैं। कई मोर्चो पर काम करने के की जरूरत होगी जिसमें महिलाओं का आर्थिक हिस्सेदारी से लेकर निर्णय की स्वतन्त्रता तक रास्ता तय करना होगा। पितृसत्ता की प्राथमिक और महत्वपूर्ण पाठशाला में महिलाओं के लिए विषय बदलने होगें,स्त्री अधिकारों का सबसे बडें दमनकारी केन्द्र बने हुए हैं। इन्ही से समाज भी बनता हैं । वहाँ आवाज उठी तो भरोसा रखिएं एक युगान्तरकारी परिवर्तन देखने को मिलेगा इसके बाद.इडिया गेट का चेहरा देखनें औऱ लाठी खाने की जरूरत नहीं पडेगी अगर हम और आप ऐसा नहीं कर सके तो ये विरोध और कई दिनो तक की लड़ाई अधूरी और अपनें लक्ष्य को पाएं बिना खत्म हो जाएगी और हम फिर एक और दिल्ली में बलात्कार का इन्तजार कर रहें होगे ताकि फिर से एक बार फिर इंडिया गेट पर पहुच सकें। दिल्ली में इस लिए क्योंकि देश के बाकी हिस्सों में हो रहें लगातार बलात्कार पर हमारा और मीडिया का ध्यान इतनी आसानी से नहीं जाता हैं। समाजिक जवाबदेही की लडाई लम्बी जरूर हैं पर अगर सच में हम अपने समाज को बदलना चाहते हैं तो इसके लिए हमें इसके लिए ना सिर्फ अभी से लड़ना होगा बल्कि एक सामाजिक चेतना के साथ कई मोर्चों पर लडना होगा, तब कहीं हम कुछ बदल सकेगें वरना कैडिल लाइट विरोध और राजपथ का विरोध सिर्फ जो सिर्फ दिखावा रह जाएगा। 



शिशिर कुमार यादव 


य़ह लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में  28 दिसम्बर के  अंक में   "घर बने विरोध की प्रयोगशाला" के नाम से प्रकाशित हुआ